भारतीय ग्रामीण विकास में स्व-सहायता समूह का योगदान-एक आर्थिक अध्ययन (रीवा जिले के विशेष संदर्भ में)

 

रवि प्रकाश पाण्डेय1, रामजी बंशकार2

1सहा. प्राध्यापक (वाणिज्य), शारदा महाविद्यालय, सरला नगर, मैहर जिला सतना (.प्र.)

2शोधार्थी (वाणिज्य), शास विवेकानंद स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मैहर, जिला सतना (.प्र.)

*Corresponding Author E-mail: vcservices25@gmail.com

 

ABSTRACT:

स्व-सहायता समूह ग्रामीण गरीबांे की आर्थिक उन्नति का सशक्त मंच बनकर उभर रहे हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय की इस योजना से गरीब भारत की तस्वीर बदलने लगी है। इसमें कोई शक नहीं है कि स्व-सहायता समूह का निर्माण भारत सरकार का एक क्रांतिकारी कदम है, जिसके माध्यम से सिर्फ लोगों को रोजगार उपलब्ध करा सके, बल्कि एकजुट होकर सामाजिक कुरीतियां, नारी उत्पीड़न और लोगों के मन से बड़े-छोटे के भेदभाव को भी मिटा सके। वहां ये समूह ग्रामीण गरीबों की आर्थिक उन्नति का सशक्त मंच बनकर उभर रहे हैं। भारत में स्व-सहायता समूहों का विकास तो तेजी से हो रहा है, परंतु इन समूहों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। प्रशिक्षण का अभाव, और भी कई कठिनाईयाँ और चुनौतियाँ है जिन पर ध्यान देकर स्व-सहायता समूह व्यवस्था को 9 अधिक कारगर लाभप्रद बनाया जा सकता है। इनमें एक पहलु लघु ऋण देने वाले बैंक की भूमिका से जुड़ा है। वाणिज्यिक बैंक की ऋण नीतियाँ स्व-सहायता समूहांे की संरचना उद्देश्यों से मेल नहीं खाती। बैंक को स्व-सहायता समूह की अवधारणा समझने में ही लंबा समय लग जाता है और जब समझ जाते हैं तब भी पर्याप्त ऋण उपलब्ध नहीं करा पाते। स्व-सहायता समूहांे का विकास अन्य समुचित एजेंसियों से जुड़ाव नहीं हो पाया है। समूह एक अलग इकाई के रुप में काम करते हैं। जिससे कोई बड़ी या महत्वपूर्ण गतिविधि को हाथ में नहीं ले पाते, इसका परिणाम यह होता है कि उनमें उत्साह नहीं रहता और वे निष्क्रिय होने लगते हैं। यदि इन समूह को सरकारी परियोजनाओं या पंचायत के कार्यों से जोड़ दिया जाता है तो इनकी उपयोगिता निश्चित रूप से बाव भी दे सकते हैं। आवश्यकता इस बात कि है की स्व-सहायता समूहों को सरकार पर्याप्त मात्रा में समय-समय पर धन उपलब्ध कराती रहे।

 

KEYWORDS: स्व-सहायता समूह, आर्थिक स्थिति, ग्रामीण विकास

 

 


INTRODUCTION:

हमारा देष एक ग्राम प्रधान देष है तथा ग्राम प्रधान देष होने के कारण यहॉ की 72 प्रतिषत जनसंख्या गॉव में निवास करती है तथा प्रत्येक गॉव की विभिन्न प्रकार की समस्याएं होती है। इन सारी समस्याओं में से एक मुख्य समस्या बेरोजगारी तथा आर्थिक स्थिति की समस्या है, जिसके लिए वर्तमान में क्या बहुत पहले से अपने देष की सरकार शुरूआत से ग्रामीण क्षेत्रों की समस्या को लेकर प्रत्येक गॉव में गरीबी निवारण तथा आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए षुरू से ही प्रयास करती रही है। लेकिन पूर्ण रूप से इस समस्या का समाधान अभी तक नहीं हो पाया है।

 

इन आदि समस्याओं को ध्यान में रखते सरकार ने गरीब परिवारों के उत्थान के लिए तथा उनके जागरूकता पैदा करने के लिए अनेक प्रकार के जनजागरूकता के अभियान तथा विभिन्न प्रकार की योजनाओ का क्रियान्वन किया जा रहा है जिससे कि गरीब परिवारों की सामाजिक तथा आर्थिक एवं ग्रामीण महिलाओं की स्थिति अधिक मजबूत को सके। इसके लिए ैण्भ्ण्ळण् के माध्यम से पुरूष/ग्रामीण महिलाओं को जोड़ा जा रहा है जिससे कि समूह में जुड़कर आपसी भाई चारा तथा लिंग भेद तथा समूहों के माध्यम से छोटे-छोटे कुटीर उद्योग या व्यवसाय स्थापित करवाये जाते है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके और अपने परिवार का भरण पोषण आसानी के साथ कर सकें।

 

स्व-सहायता समूह निःसंदेह गरीबी निवारण तथा ग्रामीणजनों के सशक्तिकरण विशेषकर ग्रामीण महिलाओं के क्षेत्र में अभूतपूर्व भूमिका निभा रहे हैं। किन्तु केवल स्व-सहायता समूह बना लेने से या गठन कर देने से उपरोक्त वणर््िात दोनों उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं होगी। समूह गठन करना निःसंदेह महत्वपूर्ण है, किंतु साथ ही साथ उसके विभिन्न तकनीकि पक्षों की ओर भी ध्यानाकर्षित करना जरूरी है। इसीलिए यह प्रयास किया जा रहा है कि अधिक से अधिक लोग स्व-सहायता समूह के उन तकनीकि पक्षों को जाने जो किसी भी स्व-सहायता समूह को पूर्ण रूप से विकसित करने एवं गरीबी उन्मूलन के लिए आवश्यक हैं समूह के तकनीकि भागों का सविस्तार वर्णन अलग-अलग भागों में किया गया है।

 

भारत में स्व-सहायता समूह अपेक्षाकृत नया प्रयोग है लेकिन पिछले कुछ वर्षांे में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आँकड़ों पर ध्यान दिया जाये तो सर्वाधिक वृद्धि आंध्र प्रदेश में हुई है। स्व-सहायता समूह ग्रामीण महिलाआंे का ऐसा अनौपचारिक समूह है, जो अपनी बचत तथा बैंक के सूक्ष्म वित्तियन से अपने समूह की पारिवारिक व्यक्तिगत जरुरत को पूरा करता है और विकास संबंधी कार्यक्रम के माध्यम से गरीबी जेसे अभिशाप को दूर करने तथा ग्रामीण महिला सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रायः स्व-सहायता समूह एकजुटता के प्रतीक होते हैं। यहां एक जेसे ही आर्थिक और सामाजिक स्थिति के लोग साथ आते हैं। समूह के सभी सदस्य थोड़ी-थोड़ी बचत करके आपसी सहयोग से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्व-सहायता समूह का विचार पड़ोसी देश बांग्लादेश में खूब चर्चित हुआ। ग्रामीण बैंक‘‘ के नाम से प्रचलित इस समूह को प्रचारित और स्थापित करने का श्रेय प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मोहम्मद युनूस को जाता है। इसी को देखते हुए भारत में भी यह विकसित हुई। भारत में स्व-सहायता समूह की शुरुआत 1992 में नाबार्ड ने एक योजना के तहत की, लेकिन इसे प्रचलित होने में काफी समय लग गया। भारत में गठित 42.05 लाख से अधिक स्व-सहायता समूहांे में से लगभग 60 प्रतिशत तो ग्रामीण महिलाओं से ही संबंधित है।

 

भारत में स्व-सहायता समूह की संख्या में ग्रामीण महिलाआंे की ज्यादा सहभागिता का कारण देश की लगभग 60 प्रतिशत गरीब ग्रामीण महिला जनसंख्या का होना है। भारत के ग्रामीण परिवारों को केवल कृषि के लिए बल्कि पारिवारिक जिम्मेदारियाँ पूरी करने के लिए भी गैर संस्थागत ऋण स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। देश में बैंक ने अनेक योजनाएं तो चलायी, लेकिन इसकाुायदा वास्तव में बड़ा वर्ग ही ले गया। स्व-सहायता समूह के माध्यम से जो पहल ग्रामीण महिलाओं ने की है, वो सराहनीय है। स्व-सहायता समूह की अवधारणासंगठन में शक्ति पर आधारित हें तिनकों से बनी रस्सी जिस प्रकार शक्तिशाली गजराज को बांध सकती है, उसी प्रकार आर्थिक रुप से कमजोर लोग भी मिलकरगरीबी के दुष्चक्र को तोड़ सकते हैं। स्व-सहायता समूह मुख्य रुप से गरीबी में जीवनयापन कर रहे लोगों के जीवन स्तर के उन्नयन के लिए निर्मित किया जाता है। स्व-सहायता समूह के पीछे मान्यता यह है कि बिखरे हुए लोगों को तो उत्पीड़ित शोषित किया जा सकता है, लेकिन यदि उन्हें संगठित किया जाए तो वे बड़ी ताकत बन जाते हैं। समूह के सदस्य मिलकर एक ऐसी ताकत का निर्माण करते हैं। जिससे वे स्थानीय शोषणकर्ताओं, सेठ-साहूकारो, बाहुबलियो आदि के अत्याचारांे का जमकर विरोध कर सकते हैं और उन पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। स्व-सहायता समूह इस बात में विश्वास करता है कि लोग आपस में मिलजुलकर अपनी दैनिक जीवन से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक कदम उठा सकते हैं। वे अपने कामांे का स्वयं उचित प्राथमिकता निर्धारण करने उससे जुडे़ निर्णय लेने में समर्थ हैं। उनके पास जीवन से जुड़े अनेक तरह के ज्ञान अपार अनुभव हैं जिनको वे व्यवस्थित तरीके से उपयोग करंे तो उनके जीवन से बदहाली खत्म हो सकती है। समूह के सदस्यांे को थोड़े परामर्श प्रेरणादायक नेतृत्व की जरूरत होती है। ग्रामीण भारत में ग्रामीण महिला स्व-सहायता समूहांे ने हजारो लाखो अशिक्षित गरीब वर्ग की ग्रामीण महिलाओं को केवल घर की चौखट के बंधन से मुक्त कर बाहर निकाला है बल्कि उन्हें महत्वपूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने में समर्थ बनाया है। इसके साथ-साथ उन्हें एक सामूहिक आवाज भी दी है।

 

भारत में स्व-सहायता समूहों की शुरूआत विकास कुछ स्वयं सेवी संगठनों ने गरीब ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर आय संवर्द्धन गतिविधियों के संचालन के लिए 1980 के दशक के अन्त में की। 1990 के दशक की शुरूआत में राष्ट्रीय कृषि ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की पहल विशेष रूचि लेने से स्व-सहायता समूह देश भर में फैल गए। अब तो सभी सरकारी बैंक आर्थिक सामाजिक संगठन इसकी महत्ता को स्वीकार कर इसके विकास को प्रोत्साहित कर रहे हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी का दन्श झेल रहे परिवारांे को गरीबी से मुक्ति दिलाने के लिए स्व-सहायता समूह एक नयी आशा की किरण लेकर आया है। गरीबी उन्मूलनके नारे तो कई दशकों से लगते रहे हैं लेकिन गरीबी खत्म होने की जगह अब तक गरीब ही तबाह होते रहे हैं। अब स्व-सहायता समूह गरीबी को खत्म करने के सपने को हकीकत में बदलने में सक्षम साबित हो रहे हैं। स्व-सहायता समूह समाज कार्य के इस मूल सिद्धांत पर आधारित है कि किसी भी व्यक्ति की सहायता इस प्रकार से करें कि वह अपनी सहायता स्वयं करने में सक्षम हो जाए। स्व-सहायता समूह के माध्यम से ग्रामीण महिला सदस्यों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जाती है। इसके द्वारा सदस्य ग्रामीण महिलाएं आपस में मिलजुलकर एक-दूसरे की मदद करती हैं और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पहल करती हैं तथा उसके समाधान तक पहुंचती है।

 

अध्ययन की प्रासंगिकता एवं महत्व:

भारत ग्रामों में बसता है। देश की दो-तिहाई जनसंख्या ग्रामों में रहती है। ग्रामों में आय का प्रमुख स्त्रोत कृषि एवं उससे सम्बन्धित गतिविधियां हैं। ग्रामों की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा लघु सीमान्त कृषक एवं दिहाड़ी मजदूरो की श्रेणी में आता है। ग्रामों में गरीबी के कारण लोगांे की आय काफी कम है। बचत एवं पूंजी की कमी एवं पूंजी लगाने के साधनों का पूर्णतया अभाव है। इन परिस्थितियों में स्व-सहायता समूह ग्रामों में गरीबों की आवष्यकताओं की पूर्ति करते हैं। स्व-सहायता समूह योजना एक प्रमुख गरीबी उन्मूलन और रोजगाार सृजक कार्यक्रम है। जिस पर केन्द्र राज्य शासन द्वारा करोड़ो रूपये व्यय किये जाते हैं। जिससे गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले निर्धनों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया जा सके एवं ग्रामीण ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक स्तर में सुधार लाया जा सकें स्थायी आय सृजन करने एवं निर्धनता रूपी कोढ़ को मिटाने के लिए, स्वरोजगार की दिशा मे ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए स्व-सहायता समूह की अवधारणा ग्रामीण गरीबी उन्मूलन एवं ग्रामीण विकास के लिए एक सार्थक योजना है या नहीं। प्रस्तुत शोध के माध्यम से इन्हीं तथ्यों को दृष्टिगत रखकर विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है। उपर्युक्त संदर्भ में जानना आवश्यक है कि व्यावहारिक रूप में ग्रामीण ग्रामीण महिलाओं को इस योजना का लाभ मिल रहा है या नहीं। स्व-सहायता समूह के गठन क्रियान्वयन से ग्रामीण महिला सदस्यांे को कितनी अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। यह जानना आवश्यक है कि बालाघाट और मण्डला (अध्ययन क्षेत्र) में स्व-सहायता समूह योजना द्वारा कितनी ग्रामीण ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं। उनके सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कितना बदलाव आया है। इसकी वास्तविक जानकारी हेतु इस योजना के ग्रामीण गरीबी उन्मूलन में योगदान का मूल्यांकन करना प्रासंगिक लगता है। यही अध्ययन की प्रासंगिकता महत्व है।

 

शोध प्रविधि-

किसी भी शोध कार्य को उद्देश्यहीन एवं ज्ञानरहित नहीं कहा जा सकता है। इसके लिए कुछ निश्चित कारकांे से प्रेरित होकर ही निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये शोध-कार्य किया जाता है। ज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य अपरिहार्य है। वर्तमान युग में शोध या अनुसंधान का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि किसी भी क्षेत्र से संबंधित तथ्यों का प्रमाणीकरण, नवीनीकरण, एवं सत्यापन अनुसंधान के द्वारा ही किया जा सकता है।

 

शोध कार्य में रीवा जिले के ग्राम विकास में स्व सहायता समूह के योगदान से सम्बन्धित वास्तविक एवं विश्वसनीय आंकड़ों को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आंकड़ों को एकत्र कर पूर्ण किया गया है। प्राथमिक आकड़े स्वयं कार्य स्थल पर जाकर मूल स्रोतों एवं साक्षात्कार अनुसूची द्वारा एकत्र किये गये हैं। जबकि द्वितीयक आंकड़े रीवा जिले के ग्राम विकास में स्व सहायता समूह के योगदान से संबंधित विभिन्न प्रकाशित- अप्रकाशित पुस्तकों, शोध पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, आदि से एकत्र कर प्रयोग किये गये हैं।

 

अध्ययन का उद्देश्य:

किसी भी सामाजिक अनुसंधान की वैज्ञानिक स्थिति, उसमें प्रयुक्त वैज्ञानिक स्थिति, निष्पक्ष निष्कर्ष, वास्तविक ज्ञान, उसमें प्रयुक्त वैज्ञानिक पद्धति की सफलता, सामाजिक घटनाओं के संबंध में अनुभवात्मक ज्ञान की प्राप्ति, सत्यापन की आवश्यकता एवं भावी अनुसंधान की संभावनाओं को विकसित करने के लिए अध्ययन के उद्देश्य निर्धारित करना आवश्यक हो जाता है। अतः प्रस्तुत शोध कार्य हेतु निम्न उद्देश्य निर्धारित किये गये हैं।

1- स्व-सहायता समूह की कार्यशैली ज्ञात करना।

2- स्व-सहायता समूह की बैंक प्रक्रिया का अध्ययन करना।

3- स्व-सहायता समूह को चलाने वाली ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन करना।

4- स्व-सहायता समूह की ग्रामीण महिला सशक्तिकरण में भूमिका का अध्ययन करना।

5- स्व-सहायता समूह की गरीबी उन्मूलन में भूमिका का अध्ययन करना।

6- स्व-सहायता समूह के क्रियान्वयन में आने वाले बाधक एवं सहायक कारको का अध्ययन करना।

7- स्व-सहायता समूह के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए उचित सुझाव प्रस्तुत करना।

 

अध्ययन की उपकल्पना:

किसी के प्रकृत होने से पूर्व फल की कल्पना प्रत्येक व्यक्ति करता है, किंतु विषय पर शोध के पूर्व उसके परिणाम के विषय में उसके अनुमान के आधार पर जो कल्पना होती है, उसे उपकल्पना कहते हैं। प्रस्तुत शोध कार्य निम्न उपकल्पनाओं पर आधारित है।

1- गरीबी को दूर करने के लिए सरकार द्वारा चलाये जा रहे अन्य कार्यक्रमों की अपेक्षा स्व-सहायता समूह गरीबी उन्मूलन करने में समर्थ है।

2- ग्रामीण जीवन में स्व-सहायता समूह ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक विकास हेतु अधिक जागरुक और आंदोलित हो रहा हें

3- स्व-सहायता समूह को ग्रामीण महिलाओं के विकास में पर्याप्त जनसमर्थन आथर््िाक शोषण से मुक्ति में पर्याप्त सफलता मिल रही है।

4- स्व-सहायता समूह से गरीबी को दूर करने में ग्रामीण महिलाओं को लाभ नहीं मिल पा रहा है।

 

अध्ययन क्षेत्र:-

प्रस्तुत अध्ययन रीवा जिले के संबंध में है जिसकी कुल जनसंख्या जनगणना 2011 के अनुसार लगभग 2,365,106 है, जिसमें से पुरुष 1,225,100 एवं महिलाएँ 1,140,006 है एवं 1000 पुरुषों के अनुपात में 960 महिलाएँ है। शोधार्थी द्वारा अध्ययन क्षेत्र में जाकर अनुसूची साक्षात्कार विधियों के माध्यम से आंकड़े एकत्रित किये गये जिसमें से शोधार्थी द्वारा 200 व्यक्तियों को लेकर के शोधकार्य पूरा किया अध्ययन के दौरान जो ऑकड़े एकत्रित किये गये उनका परिचयात्मक विश्लेषण निम्नानुसार है।

 

आकड़ों का वर्गीकरण और सारणीयन:-

अनुसंधानकर्ता द्वारा तथ्यों को प्राप्त करने के बाद संकलित तथ्यों को सारणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है और साख्यकीय विष्लेषण किया गया है।

 

के. ममता कृष्णा मायराडाअनुभव स्व-सहायता समूहों के क्षमता निर्माण के लिए एक निर्देषिका, अक्टूबर (2001)- इस निर्देषिका को केन्द्रीय परियोजना सहायता इकाई, मानव-संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार एवं मायरडा . सर्विस रोड, डोमलूर लेआउट, बैंगलोर द्वारा प्रकाशित किया गया था। इसका हिन्दी संस्करण स्वषक्ति परियोजना, भारत सरकार द्वारा अनुवादित एवं मुद्रित किया गया हें स्व-सहायता समूहों के संदर्भ में लिखित यह निर्देषिका स्व-सहायता समूहों के मार्ग दर्शन के लिए अत्यन्त उपयोगी है। प्रस्तुत निर्देषिका में स्व-सहायता समूहांे के निर्माण एवं शुरूआती दोर में आने वाली छोटी-छोटी कठिनाईयों को हल करना है। स्व-सहायता समूहों के साथ काम करने वाली एजेंसी के सामने सबसे महत्वपूर्ण आवष्यकता स्व-सहायता समूहों के प्रषिक्षण की होती है जिससे वे अपनी बैठक को संचालित कर सके, कम खर्चांे की अवधारणा को समझ सके और अपने फंड को निरंतर घुमाते रहे। स्व-सहायता समूहों को प्रारम्भिक अवस्था में नियम बनाने पड़ते हैं, जिससे समूहों में होने वाले क्रियाकलापों को आसानी से संचालित किया जा सकें समूहों में होने वाले विवादों को आसानी से हल किया जा सकें सर्वाधिक प्राथमिकता ऋण देने एवं उसे वसूल करने की होती है। जिसके लिए ठोस नियम बनाना आवश्यक होता हें इन स्व-सहायता समूहों से संब ंधित लगभग सभी पहलुओं को अत्यन्त सरल भाषा में उदाहरण सहित समझाया गया है। स्व-सहायता समूहांे के प्रषिक्षण एवं उनकी क्षमता निर्माण हेतु व्यवस्थित प्रक्रिया को माध्यम बनाया गया है। यह निर्देशिका मायराडा (मेसूर रिपब्लिकेषन एण्ड डेवलपमेन्ट ऐजेंसी) अनुभव पर लिखी गई हें मायराडा मुख्य रूप से पाँच क्षेत्रों में ट्रेनिंग देता है, जिसमें स्व-सहायता समूहों का प्रषिक्षण भी एक है।

 

विश्नोई, कुरूक्षेत्र, (मार्च 2001)- भारत में ऐसे दीन-हीन लोगों के लिए एक योजना शुरू की गई थी, जिसमें लोग अपने आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए 10-20 लोगांे को मिलाकर स्व-सहायता समूह बनाते थे। वे स्वयं अपने पास की अल्प राशि बचत कर बैंक में जमा करते और फिर बैंक के माध्यम से उन्हंे आवश्यक ऋण सुविधा उपलब्ध कराई जाती थी। आधे दषक तक यह योजना इसीलिए धीमी गति से चल रही थी क्योंकि बैंक ने इसमें कोई रूचि नहीं ली थी। वर्ष 1998 में केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त कर स्व-सहायता समूह आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा गुजरात आदि प्रदेशों में अधिक विकास कर आगे निकल गये। इस लेख में बताया गया है कि मध्यप्रदेश में समूहों को बैंक से ऋण मिलना देरी से शुरू हुआ।

 

स्व-सहायता समूह ग्राम या नगर के व्यक्तियों के छोटे-छोटे समूह होते हैं। जिसके माध्यम से एक जैसी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति के लोग अपनी समस्याएं परस्पर सहयोग से हल करने का प्रयास करते हैं। स्व-सहायता समूह ग्राम, मोहल्ले, या टोले के होते हैं। स्व-सहायता समूहों में ग्रामीण अपनी इच्छा से संगठित होते हैं। गरीब अपनी थोड़ी-थोड़ी बचत कर सामूहिक निधि में जमा करते हैं। स्व-सहायता समूह द्वारा इस राशि का उपयोग सदस्यों की आकस्मिक जरुरतों जैसे बीमारी के लिये, काम धंधे के लिये, आपसी लेन-देन द्वारा किया जाता हे। स्व-सहायता समूह के सदस्य एक सप्ताह, पन्द्रह दिन या महीने में एक बार बैठक कर विभिन्न विषयों पर सामूहिक चर्चा कर एक दूसरे की समस्याओं का समाधान करते हैं। स्व-सहायता समूह के सदस्य एक समान सामाजिक, आथर््िाक पृष्ठभूमि के होते हैं। जिससे ये आपस में बेझिझक बात कर पाते हैं। स्व-सहायता समूह के अपने नियम होते हैं जिसका पालन समूह के सभी सदस्य आवश्यक रूप से करते हैं। स्व-सहायता समूह पुरुषों या ग्रामीण महिलाओं के होते हैं। मिले जुले समूह भी पाये जाते हैं। स्व-सहायता समूह में ग्रामीण महिलाएं अधिक सक्रिय रूप से भाग लेती हैं।

 

स्व-सहायता समूह के उद्देश्य

स्व-सहायता समूह के माध्यम से गरीबों के सामाजिक-आर्थिक स्थिति में बदलाव लाना। 

ग्रामीणों में विषेषकर ग्रामीण महिलाओं में छोटी-छोटी बचत को करने की प्रवृत्ति उत्पन्न करना। 

ग्रामीणों में छोटी-छोटी बचत को जमा करने की प्रवृति का उदय करना। 

ग्रामों को सेठ, साहूकारों अन्य सम्पन्न वर्गों के चंगुल से मुक्त कराना। 

समूह में सम्मिलित सदस्यों में नेतृत्व क्षमता विकसित करना।

एक आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के निर्माण में योगदान।

ग्रामीण क्षेत्र में सामुदायिक भावना का विकास करना।

 

स्व-सहायता समूह की विषेषताएं

समूह के अपने स्वयं के नियम कानून होते हैं।

समूह पंजीकृत या गैर पंजीकृत हो सकता हे। 

स्व-सहायता समूह का आधार उसके सदस्यों द्वारा आन्तरिक रुप से संग्रह की गयी बचत हे।

स्व-सहायता समूह के सदस्य आन्तरिक ऋण का लेन देन करते हैं। 

स्व-सहायता समूह के सदस्य अपने हिसाब किताब के लिये बही खाते का रख रखाव एवं संचालन स्वयं करते हैं। 

स्व-सहायता समूह के सदस्य समूह के नाम पर एक बचत खाता बैंक में खुलवाते हैं एवं उसका संचालन करते हैं।

 

स्व-सहायता समूह ग्रामीण महिला सदस्य को सषक्त करने हेतु एक सषक्त साधन है अतः इस प्रक्रिया को किसी एक उद्देष्य से जोडकर पूरे ग्रामीण महिला समाज के उत्थान के मुद्दांे से जोडा गया है। स्व-सहायता समूह से मूल्य संस्कृति एवं इससे प्रगति जुडी हुई है। देखा जाए तो प्रत्येक ग्रामीण महिला का सम्बन्ध अपने षिषु को जन्म देने से लेकर एक अच्छे अनुषासित नागरिक बनाने की असीम ललक सी रहती है उसी प्रकार समूह निरन्तर चलने वाली कभी टूटने वाली प्रक्रिया होती है। समूह को हम जब कुछ लोग निष्चित लक्ष्यों या सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वे एक मंच का निर्माण करते हैं इसमें षामिल हुए लोग आर्थिक स्थित से कमजोर तथा सामान्य उद्देष्य वाले व्यक्तियों का एक समूह होता है जो परस्पर आपसी सामंजस्य बनाये रखने के कारण समूह निरन्तर चलता रहता है।

 

ग्रामीण क्षेत्रों में रह रही ग्रामीण महिलाओ की वर्तमान में आर्थिक स्तर को हम देखते है कि ग्रामीण ग्रामीण महिलाओ को कौन-कौन सी योजनाओं का लाभ तथा उनको समाज मे लोगों के साथ अपनी परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने में पुरूषों की अपेक्षा ग्रामीण महिलाओं के द्वारा कितना योगदान दिया जा रहा है तथा ग्रामीण महिला सषक्तीकरण पर ग्रामीण महिलाओं में कितनी जागरूकता आई है। इसके अलावा जो ग्रामीण महिला सषक्तीकरण के लिए स्व-सहायता समूह ;ैमस िभ्मसच ळतवनचद्ध के द्वारा कितनी ग्रामीण महिलाएं अपना स्वयं का रोजगार स्थापित कर अपने परिवार को सुदृढ़ करने में कितना योगदान दे रही है। इसके अलावा जो ग्रामीण महिलाएं ैण्भ्ण्ळण् में जुडकर काम कर रही है। उनके कार्यों में गतिरोध के कौन-कौन से कारण तथा इन गतिरोध समस्याओं को जानने के लिए कुछ समाधान निकाल कर उनकी समस्या का निराकरण हो सके। इसके अलावा 10 वर्ष पूर्व की अपेक्षा ग्रामीण महिलाओ मे रोजगार की वर्तमान में क्या स्थिति चल रही है।

 

सामान्यतः ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक तथा सामाजिक एवं राजनैतिक रूप से पिछड़ी हुई थी तथा उनको समाज में लिंग भेद तथा अन्य सामाजिक दुर्बलताओं के कारण और ग्रामीण महिलाओं की बेरोजगारी तथा उनकी सभी समान स्थितियों के ध्यान मे रखते हुए सरकार द्वारा अनेक प्रकार की ग्रामीण महिलाओ से सम्बंधित योजनाओ का क्रियान्वयन किया जा रहा है।

 

स्व-सहायता समूह के गठन की षुरूआत स्वयं से होनी चाहिए और निम्न प्रकार चक्रानुसार आगे बढनी चाहिए, स्वयं अपने अनुभव के साथ सम्बद्ध करके समूह तक और समूह का प्रभाव परिवार तक, परिवार का प्रभाव मुहल्ले तक, मुहल्ले का प्रभाव गॉव तक और गॉव से क्षेत्र तक और क्षेत्र से समाज तक यात्रा करता हैं, यही समूह की परिपूर्णता होती है। कहने का आषय यह है कि जब स्वयं से इसकी शुरूआत होगी और समाज तक इसका प्रभाव जायेगा तभी उसके परिणाम स्वरूप नये समूहों का निर्माण होगा।

 

स्व-सहायतासमूहों का निर्माण रातों-रात नहीं हो जाता इसके लिए बहुत सारे सार्थक प्रयास करने पड़ते हैं लोगों को जागरूक करना पड़ता है इसके साथ ही साथ लोगो को उस क्षेत्र के बारे में छोटी-छोटी बुनियादी जानकारी हासिल करनी पड़ती है। उस गॉव के प्रधान, सचिव तथा वहॉ के मुखिया के द्वारा जाति आधारित तथा आर्थिक स्थिति से (गरीबी रेखा के नीचे) कमजोर व्यक्तियों की सूची लेनी पड़ती है। समूह के निर्माण के लिए पहले बैठक करनी पड़ती है लोगों को इस विषय के बारे में जानकारी देनी पड़ती है तथा गरीबी दूर करने से सम्बन्धित नाना प्रकार की योजनाएं एवं सेवाओं से सम्बंधित जानकारी देना अति आवष्यक है। बैठक के समय सभा में गॉव के लोगो के द्वारा समस्या तथा उन्ही के अनुसार समाधान करवाया जाता है। एवं उस गॉव का जिस गॉव में समूह निर्माण करना है। उस पर निरन्तर दौरा करते रहना चाहिए जिससे कि लोगों के मन में विष्वास उत्पन्न होता रहे तथा वे बिना किसी हिचक के स्व-सहायतासमूह में काम कर सके।

 

इस प्रकार हम कहते है कि इस प्रक्रिया मे स्व-सहायता समूह चाहे वह मिश्रित हो अथवा पुरूष, ग्रामीण महिला का अलग-अलग हो प्रत्येक दषा में समूह हमेषा छोटा होना चाहिए ताकि समूह के द्वारा ही इसका प्रबंध सुचारू रूप से किया जा सके।

 

स्व-सहायतासमूह के प्रमुख उद्देश्य है-

स्व-सहायता समूह का उद्देष्य होता है- व्यक्तिगत क्षमताओं एवं दक्षताओं के माध्यम से सामूहिक क्षमता का विकास करके समाज मे विद्यमान समस्याओं एवं आवष्यकताओं को हल करना है। अलग-अलग परिस्थितियों में निवास कर रहे समुदाय द्वारा गठित किये गए समूहो के उद्देष्य परियोजनाओं के उद्देष्य से तालमेल करके निष्चित किये जाते है जिससे की समूहों में स्थायित्व बनी रहे।

 

स्व-सहायता समूह के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार से है-

1-    गांवों में रहने वाली ग्रामीण महिलाओं को छोटे-छोटे समूहों में संगठित करना तथा ग्रामीण महिला संगठनांे को मजबूत करना है।

2-    ग्रामीण महिला समूहों के बीच सामाजिक जागरूकता के स्तर को सुदृढ़ करना।

3-    समुदायिक संगठनों जैसे कि ग्रामीण महिला मंडल, पंचायत, सहकारी समितियों आदि ग्राम संगठनों द्वारा समूहों को क्रियाषील बनाने हेतु निरन्तर मद्द करना है।

4-    समूह को इस तरीके से प्रोत्साहित करना ताकि अपनी जरूरत एवं स्थानीय साधन के अनुरूप सूक्ष्म स्तरीय आय-वृद्धि के कार्यक्रम शुरू कर सके।

5-    निर्धन ग्रामीण महिला समुदायों के बीच सामाजिक एवं गुणात्मक सुधार लाने हेतु समूह का प्रमुख उद्देष्य होता है।

6-    सामाजिक एवं आर्थिक अवसरों में गुणवत्ता युक्त सुधार लाने का योजना तक प्रयास करना।

7-    सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक तथ्य तथा अन्य महत्वपूर्ण उद्देष्य है।

8-    स्व-सहायता समूह का उद्देष्य होता है। आर्थिक स्थिति मंे बदलाव तथा गरीबी एवं बेरोजगारी को दूर करना इसका प्रमुख उद्देष्य होता है।

 

प्रश्न-1 परिवार का स्वरूपः-

तालिका क्र0 1

Ø-

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उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि समुदाय के अन्तर्गत 60 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएँ सयुक्त परिवार में रह रही हैं तथा 40 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएँ एकल परिवार में रह रही हैं।

 

प्रश्न- 2 क्या आपको स्वसहायता समूह के बारे में जानकारी हैः-

तालिका क्र0 2

Ø-

Lolgk;rk lewg ds fo"k; esa tkudkjh gSa

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64

64 izfr'kr

02

ugh

36

36 izfr'kr

 

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100

100 izfr'kr

 

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि 64 प्रतिशत ग्रामीण महिला को स्वसहायता समूह के बारे में जानकारी हैं और 36 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं को स्वसहायता समूह के बारे में जानकारी नहीं है।

 

प्रश्न-3 स्वसहायता समूह कार्यक्रम ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कार्य कर रहा है क्या आप इस नीति से सहमत हैः-

तालिका क्र0 3

Ø-

Lolgk;rk lewg xzkeh.k efgykvksa dks l'kDr cukus ds fy, dk;Z dj jgk gSA

vko`fr

izfr'kr

01

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80

80 izfr'kr

02

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20

20 izfr'kr

 

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100

100 izfr'kr

 

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि 80 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएँ इस नीति से सहमत है कि स्वसहायता समूह कार्यक्रम ग्रामीण महिलाओं को ससक्त बनाने के लिए कार्य कर रहा है और 20 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएँ इस नीति से सहमत नही है कि स्वसहायता समूह कार्यालय ग्रामीण महिलाओ को सशक्त बनाने के लिए कार्य रही है।

 

प्रश्न-4 आपके विचार में जादातर स्वसहायता समूह से जुड़ना क्यों आवश्यक है।

तालिका क्र0 4

Ø-

Lolgk;rk lewg ls tqM+us dk dkj.k

vko`fr

izfr'kr

01

xjhch nwj djus ds fy,

32

32 izfr'kr

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28

28 izfr'kr

03

xzkeh.k efgykvksa dks l'kDr cukus ds fy,

40

40 izfr'kr

04

mi;qZDr esa ls dksbZ ugha

0

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100

100 izfr'kr

 

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि 32 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि गरीबी दूर करने के लिए आवश्यक है 28 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि परिवार के विकास के लिए स्वसहायता समूह से जुड़ना आवश्यक है और 40 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए स्वसहायता समूह से जुड़ना आवश्यक है।

 

प्रश्न-5 कौन सी ग्रामीण महिलाएँ स्वसहायता समूह को गठित कर सकती या जुड सकती है

तालिका क्र0 5

Ø-

dkSu lh xzkeh.k efgyk,¡ Lolgk;rk lewg dks xfBr dj ldrh gS

vko`fr

izfr'kr

01

xjhc xzkeh.k efgyk,¡

24

24 izfr'kr

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16

16 izfr'kr

03

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32

32 izfr'kr

04

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28

28 izfr'kr

 

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100

100 izfr'kr

 

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि 24 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि गरीब ग्रामीण महिलाएँ स्वसहायता समूह को गठित कर सकती हैं 16 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि अति गरीब ग्रामीण महिलाएँ ही स्वसहायता समूह को गठित कर सकती है 32 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि समस्याग्रस्त ग्रामीण महिलाएँ ही स्वसहायता समूह को गठित कर सकती है 28 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि उक्त सभी ग्रामीण महिलाएँ स्वसहायता समूह को गठित कर सकती है।

 

प्रश्न-6 क्या स्वसहायता समूह का सदस्य के बनने पर ग्रामीण महिलाएँ अधिक आत्मनिर्भर बन जाती है-

तालिका क्र0 6

Ø-

Lolgk;rk lewg dk lnL; cuus ij xzkeh.k efgyk,¡ vkRefuHkZj gks tkrh gSaA

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01

gk¡

72

72 izfr'kr

02

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28

28 izfr'kr

 

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100

100 izfr'kr

 

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि 72 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि ग्रामीण महिलाएँ स्वसहायता समूह का सदस्य बनने पर आत्मनिर्भर हो जाती हैं जबकि 28 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि ग्रामीण महिलाएँ स्वसहायता समूह का सदस्य बनने पर आत्मनिर्भर नहीं बन पाती।

 

ग्रामीण महिला सशक्तिकरण:-

ग्रामीण महिला सशक्तीकरण या सबली करण आज का अत्यन्त ज्वलन्त प्रश्न है। सबलीकरण से यहॉं तात्पर्य है ग्रामीण महिलाओं को सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक रूप से सुदृढ़ बनाने तथा उसकी व्यक्तिगत पहचान बनाने के प्रयासो से हैं सदियों के उतार चढ़ाव के बाद जब स्त्रियों की व्यक्तिगत पारिवारिक, शैक्षणिक एवं सामाजिक स्थिति में बदलाव नही आया तो कुछ अन्तर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला संगठनों तथा समाज सेवी संगठनों ने ग्रामीण महिलाओ की स्थिति में सुधार हेतु जो कदम उठाए, स्त्रियों के हितों उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने के प्रयास को ही हम सबलीकरण कहते है। सबलीकरण की आवश्यकता पुरूषों की तानाशाही, अशिक्षा अज्ञानता, जटिल सामाजिक, प्रशासनिक व्यवस्था, ग्रामीण महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ता नारी उत्पीड़न और मानवीय मूल्यांे को ह्रास के कारण और इनके निवारण के लिए जो उपाय सरकार द्वारा किये जा रहे है। उन्हे ग्रामीण महिलासशक्ती करण का नाम दिया है।

 

आर्थिक संदर्भ में ग्रामीण महिला सशक्तीकरण-

भारत में ग्रामीण महिलाओं की स्थिति मिली जुली है। कुछ ग्रामीण महिलाओं का अपनी स्थिति पर पूर्ण नियंत्रण है तो कुछ ग्रामीण महिलाएंॅ काफी हद तक अपने पति, पिता अथवा भाइयों पर आश्रित होती हैं, बहुत सी स्त्रियां ऐसी भी है, जिनकों विचार तक व्यक्त करने की भी स्वतंत्रता नही है। आगे बढें़ तो बहुत सी ऐसी ग्रामीण महिलाएॅ भी मिल जावेगी जो अकेली ही घर-गृहस्थी की गाड़ी चलाती है और यह इसलिए नही कि वे अपने पति के द्वारा त्याग दी गई अथवा विधवा है, बल्कि इसलिए कि उनके पति उनसे इसी की अपेक्षा रखते है। गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों मे यह आम बात है। यह तथ्य कि पिछले छह वर्षों के अन्तराल में ही भारत की आबादी दस करोड़ बढ़ गई कुछ ही लोगों को आश्चर्य लगा होगा। वर्ष 2011 को अधिकारिक तौर पर यह ऑकड़ा एक अरब 25 लाख के उपर पहुॅच गया, फिर भी यह किसी मन में निराशा उत्पन्न नहीं करता। देश का जनसंख्या नियंत्रण बजट जो एक समय मात्र 65 लाख रूपयें था, अब बढ़कर 3520 करोड़ रूपये हो गया है। आज ग्रामीण महिलाओं को अधिकार सम्पन्न बनाने की आवश्यकता है, ताकि संतति नियंत्रण में उन्हें सही चुनाव का अवसर मिल सके। शिक्षा अभियान और साक्षरता आन्दोलनों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को सीमित परिवार के प्रति अधिक जागरूक बनाया जा सकता है। इस समस्या का समाधान नौकरियॉ ग्रामीण महिलाओं तक ले जाना भले ही हो, लेकिन यदि घर के पास ही रोजगार के पर्याप्त अवसरों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन द्वारा उनके लिए एक निश्चित आमदनी की व्यवस्था कर दी जाए तो उनका बोझ काफी हद तक कम किया जा सकता है। स्व सहायता समूहों तथा स्व रोजगार योजनाओं के माध्यम से अनेक ग्रामीण महिलायें आर्थिक दृष्टि से अधिक समृद्ध हो सकती है।  

 

सुझाव:-

1-  समस्त आयु वर्ग की ग्रामीण महिलाओं को S.H.G में सहभागिता हेतु प्रेरित करना आवश्यक है।

2-   अनुसूचित जाति एवं जनजाति की ग्रामीण महिलाओं को भी S.H.G हेतु जोड़ने के प्रयास करने की जरूरत है।

3-   मजदूरी एवं कृषि कार्य में संलग्न गरीब ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी S.H.G में बढ़ाने की आवश्यकता है।

4-   S.H.G से जुड़ी समस्त ग्रामीण महिलाओं को परिवार नियोजन से सम्बन्धित जानकारी एवं जागरूक करना उचित होगा।

5-   S.H.G के अतिरिक्त भी अन्य आर्थिक गतिविधियों में गरीब ग्रामीण महिलाओं को जोड़ने की आवश्यकता है। जिससे उनका आवश्यक आर्थिक सषक्तीकरण हो सके।

6-   S.H.G में जुड़ने वाली सभी ग्रामीण महिलाओं के साक्षर होने की व्यवस्था करना उचित होगा। 

 

संदर्भ ग्रन्थ सूची

1.       राय, पारसनाथ (1973) अनुसंधान परिचय, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल आगरा।

2.       शुक्ला एस0एम0, सहाय एस0पी0(2005) सांख्यिकी के सिद्धान्त साहित्य भवन पब्लिकेशन हास्पिटल रोड़ आगरा।

3.       पाण्डे तेजस्कर, पाण्डेय ओजस्कर (2009) समाज कार्य भारत बुक सेंटर 17, अशोक मार्ग, लखनऊ।

4.       गुप्ता एम.एल, शर्मा डी.डी. (1998) समाजशास्त्र साहित्य भवन पब्लिकेशन आगरा,

5.       डॉ. रवीन्द्र पस्तौर: क्रियान्वयन मार्गदर्शिका, द्वितीय चरण, 2009

6.       अजीत कुमार (परियोजना समन्वयक): स्व सहायता समूह प्रशिक्षण मार्गदर्शिका

7.       डॉ0 मिश्रा, नन्द लाल, विकास की चुनौतियाँ

8.       डॉ0 अग्रवाल, गोपाल कृष्ण, सामाजिक समस्याए

 

 

 

Received on 27.03.2024         Modified on 12.04.2024

Accepted on 20.04.2024         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2024; 12(1):57-66.

DOI: 10.52711/2454-2687.2024.00011